नये चेहरे

मैं
चेहरे नये
गढ़ लेता हूँ

जब…
पुराने लोगों से मिलता हूँ

हैरान हूँ
के वो
खुश भी हो जाते हैं
नये चेहरे देख कर

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तन्हा हूँ मैं

चाँदनी रात है…
पर तन्हा हूँ मैं
चाँद भी मेरी तरह उदास है
फिर भी तन्हा हूँ मैं

इक बहाना है
तुझे भुलाने का
(वैसे पीता नहीं हूँ मैं)
जाम भी शोकसार है
फिर भी तन्हा हूँ मैं

किसी के काँधे पर सर रख कर
बहुत रोया हूँ
आँख उसकी भी लाल है
फिर भी तन्हा हूँ मैं

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हादसा…

एक हादसे
के 
इर्द गिर्द
जमी भीड़ 
सा कुछ
दिखा मंज़र

पास आया तो समझा
के लोग ताक रहे थे
मेरी ही लाश को

लोग
खुश थे 
हादसा
उनके साथ नहीं हुआ था

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रूबरू…

कितना मुश्किल है
रूबरू होना

कहीं ना कहीं 
कुछ बीच में 
 ही जाता 
है

चाहे वो रिश्ते को 
नाम देने की 
उम्मीद
ही क्यूँ ना 
हो

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खिले पुष्प …

खिले पुष्प …
जब तुम 
मुस्कुराए

मुरझाए
जब तुम ना आए

बिखरे
तुम्हारे जाने पर

बंद क़िताबें
खोल 
सहला लेता हूँ 
पंखुड़ीयाँ

याद आने पर

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ख़ामोश चीख़

खामोशी
को शब्द
खा गये

बहुत बचना चाहा उसने
पर
शब्दो के समूह से घिरी थी वो
कहाँ तक बच पाती

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अपूर्ण…

धरती कॅन्वस है
आकाश ब्रश है

तेरी तस्वीर फिर भी नहीं बनती
मेरे हाथ 

रोक लिए हैं वक़्त ने

(और देवता हंस रहें हैं…)

शब्द गुम हैं
फिर भी
सदियो से कितना कुछ कह चुका हूँ मैं

तुमने सुना नहीं शायद
(पर देवता हंस रहें हैं)

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नारी…

नारी
घर में
माँ है
बहन है
बेटी है
बीवी है
ये उसकी मर्यादा है

घर के बाहर
सिर्फ़ मादा है

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रशक़

मैं उससे रशक़ करता हूँ.
क्यूंकी वो मुझसे ज़्यादा अच्छा लिखता है
ऐसा क्यूँ है मैं नहीं जानता

शायद तू उसके पास है
इसलिए

यह ठीक नही है
जानता हूँ मैं
पर क्या करु

वो सच में अच्छा लिखता है

उसकी लिखी हुई 
चीज़ें पढ़
मैं भूल जाता हूँ
के तू उसके पास है

वो इतना अच्छा लिखता है… 

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थोड़ा थोड़ा भागा भागा सा…

खुद से ही भागता रहता है आदमी
और रहता है खुद की ही तलाश में

फिल्म पत्रकारिता करते करते खुद से बाते करने की फ़ुर्सत ही नही मिली 
पर अब समय निकल कर खुद से कुछ कहना चाहता हूँ

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