Archive for अक्टूबर 3, 2008

हादसा…

एक हादसे
के 
इर्द गिर्द
जमी भीड़ 
सा कुछ
दिखा मंज़र

पास आया तो समझा
के लोग ताक रहे थे
मेरी ही लाश को

लोग
खुश थे 
हादसा
उनके साथ नहीं हुआ था

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रूबरू…

कितना मुश्किल है
रूबरू होना

कहीं ना कहीं 
कुछ बीच में 
 ही जाता 
है

चाहे वो रिश्ते को 
नाम देने की 
उम्मीद
ही क्यूँ ना 
हो

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खिले पुष्प …

खिले पुष्प …
जब तुम 
मुस्कुराए

मुरझाए
जब तुम ना आए

बिखरे
तुम्हारे जाने पर

बंद क़िताबें
खोल 
सहला लेता हूँ 
पंखुड़ीयाँ

याद आने पर

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ख़ामोश चीख़

खामोशी
को शब्द
खा गये

बहुत बचना चाहा उसने
पर
शब्दो के समूह से घिरी थी वो
कहाँ तक बच पाती

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अपूर्ण…

धरती कॅन्वस है
आकाश ब्रश है

तेरी तस्वीर फिर भी नहीं बनती
मेरे हाथ 

रोक लिए हैं वक़्त ने

(और देवता हंस रहें हैं…)

शब्द गुम हैं
फिर भी
सदियो से कितना कुछ कह चुका हूँ मैं

तुमने सुना नहीं शायद
(पर देवता हंस रहें हैं)

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